मैं कैसे 'बिगड़ा' था: एक मई दिवस की कहानी
— एक मई की सुबह, एक कलम की बग़ावत —
आज पहली मई है। और आज, इस भोर के सुरमई उजाले में, मुझे याद आता है — मैं कैसे "बिगड़ा" था।
साल था 1984। उम्र कच्ची, कक्षा ग्यारहवीं। पर मेरा मन न पाठ्यपुस्तकों में रमता था, न ट्यूशन की चारदीवारी में।
न मुझे रास आये किताबों के सूखे पन्ने,
न समझ आये अल्जेब्रा के उलझे फ़साने।
मेरी रूह तो भटकती थी रेणु की 'मैली आँचल' में,
दिनकर के 'रश्मिरथी' में, महादेवी के नीर-भरे दु:ख में।
कक्षा पाँच से ही — रेणु जी, दिनकर जी, महादेवी वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क, प्रेमचंद और स्वामी विवेकानंद — मेरी आत्मा के असली अध्यापक थे। गणित-विज्ञान की ट्यूशन से कहीं ज़्यादा मीठे लगते थे मोहल्ले के कवि-सम्मेलन, लेखन-गोष्ठियाँ, और देर रात तक चलने वाले मुशायरे।
वह यूनियन ऑफिस, वह नारा
घर के ठीक बग़ल में था कम्युनिस्ट पार्टी का यूनियन ऑफिस। दीवारों पर लाल पोस्टर, हवा में मज़दूरों की पुकार, और एक ऐसा नारा जो मेरे कानों में घुलता चला गया —
"दुनिया के मज़दूरों, एक हो!"
यह नारा मुझे अपने जादू में बाँध रहा था। फ़ैज़ साहब की आवाज़ कानों में गूँजती —
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है।
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक,
बोल जो कुछ कहना है कह।
पहली मई, पहली कलम
और फिर आई पहली मई 1984।
मेरी कलम में जैसे बिजली कौंध गई। मैंने बैठकर लिखा — May Day पर एक लेख। न गूगल था, न ChatGPT। बस एक किशोर, उसकी जिज्ञासा, और कुछ पुस्तकालयों की धूल भरी अलमारियाँ।
शोध किया तो पाया — मई दिवस की जड़ें रूस में नहीं, बल्कि अमेरिका के शिकागो में हैं। Haymarket के उन शहीदों में, जिन्होंने आठ घंटे के काम के अधिकार के लिए अपना ख़ून बहाया।
लेख तैयार हुआ। और मैं — एक अनजान सोलह साल का लड़का — पटना से प्रकाशित बिहार के अग्रणी अंग्रेज़ी दैनिक "The Indian Nation" के एडिट पेज पर छप गया। और उसी विषय पर हिंदी में लिखा मेरा लेख दिल्ली के "दैनिक मिलाप" में प्रकाशित हुआ।
न किसी की सिफ़ारिश, न कोई जान-पहचान। न कोई अनुवाद, न कोई शॉर्टकट — दोनों भाषाओं में अपनी क़लम, अपनी मेहनत, अपना शोध।
बस, यहीं से लत लग गई।
और फिर बिगड़ता ही चला गया
एक लत दूसरी लत को बुलाती है। और मेरी "बिगड़न" का सिलसिला अब रुकने वाला नहीं था — नुक्कड़ नाटकों की धूल-भरी सड़कें, IPTA थिएटर की रौशनी, मज़दूर यूनियनों के झंडे, अदालतों की सीढ़ियाँ, छात्र राजनीति की गलियाँ।
जैसे यह सब काफ़ी न था — मेरी "बिगड़न" को और निखारने आ गए वे लोग जिनके नाम लेते हुए आज भी रूह काँप जाती है: शबाना आज़मी, परवेज़ भाई, जावेद अख़्तर साहब, और सबसे ऊपर — कैफ़ी आज़मी साहब।
कैफ़ी साहब की पंक्तियाँ रगों में दौड़ने लगीं —
कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले,
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार-सा है।
जो थोड़ी-बहुत मासूमियत बच गई थी, उसे भी ले गए वे लोग जो आज इस दुनिया में नहीं — वी.पी. सिंह जी, जॉर्ज फ़र्नांडिस जी, और मेरे अपने राम विलास पासवान जी। हर एक से कुछ सीखा, हर एक के साथ कुछ खोया, हर एक के जाने पर कुछ अपना भी चला गया।
और वह "बिगड़ैल" लड़का आज...
चार दशक की यह यात्रा कहाँ से कहाँ ले आई — सोचता हूँ तो ख़ुद पर हैरत होती है।
वह 1984 का अनजान किशोर — आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय का अधिवक्ता है। Advocate, Supreme Court of India। न्याय की उस सर्वोच्च पीठ के सामने, जहाँ हर रोज़ देश के नागरिक अधिकारों की पुकार गूँजती है।
वही क़लम जिसने मई 1984 में पहली बार छपाई की स्याही चखी थी — आज International Council of Jurists की सदस्यता तक पहुँच चुकी है। World Independent Lawyers League और Hardward Square, London के मंचों पर भी न्याय का सवाल उठाती है।
पत्रकारिता का वह नशा — जिसने पहले इंडियन नेशन और दैनिक मिलाप के पन्नों पर डेरा डाला था — वही मुझे ले गया दुनिया के आठ देशों में, और भारत के आठ राज्यों में। प्रिंट से टेलीविज़न तक, हिंदी से अंग्रेज़ी तक, अख़बार से डिजिटल तक — वह क़लम आज भी रुकी नहीं है।
और राजनीति? जो कभी मोहल्ले के उस छोटे-से यूनियन ऑफिस के लाल पोस्टरों से शुरू हुई थी — आज मुझे लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता के रूप में देश की राजनीतिक बहसों के बीचों-बीच खड़ा करती है। रामविलास पासवान जी की दी हुई वह विरासत — मेरी सबसे क़ीमती अमानत।
और सबसे ताज़ी कड़ी — एक नया घाव, एक नई शपथ
लेबनान की आग में जब पत्रकार अमल ख़लील (Amal Khalil) शहीद हुईं — अल-अख़बार की वह बहादुर रिपोर्टर, जिसे इज़राइली ड्रोन ने दक्षिण लेबनान में निशाना बनाया, और जिसके मलबे के नीचे दबे शरीर तक छह घंटे तक डॉक्टरों को पहुँचने नहीं दिया गया — और उन जैसे अनगिनत साथियों का लहू बेरूत, ग़ाज़ा, कीव, काबुल की सड़कों पर बहा — तो मेरे भीतर का वह 1984 वाला किशोर एक बार फिर जाग उठा।
पत्रकार की क़लम जब बंदूक़ की गोली से मौन कर दी जाती है — तो दुनिया का हर वकील, हर इंसाफ़पसंद इंसान गुनहगार है, अगर वह चुप रह जाए।
इसी पुकार के जवाब में जन्मा —
International Legal Protection Council of Journalists
(अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार विधिक संरक्षण परिषद)
— जिसका मैं संस्थापक हूँ।
ताकि किसी ग़ाज़ा में, किसी बेरूत में, किसी कीव या किसी काबुल में — जब कोई पत्रकार अपनी क़लम से सच लिखने की क़ीमत अपनी जान से चुकाए — तो दुनिया भर के वकीलों की एक फ़ौज उसके पीछे खड़ी मिले।
क्योंकि क़लम की हिफ़ाज़त अब अकेले क़लम वालों के बस की बात नहीं रही।
आज मई दिवस फिर पूछता है
आज, चार दशक बाद, मई दिवस फिर मेरी खिड़की पर दस्तक देता है। और कहता है — ज़िंदगी मई दिवस ही तो है। एक मुसलसल पुकार। एक स्थायी विद्रोह। एक न ख़त्म होने वाला संघर्ष।
बराबरी और न्याय के लिए दुनिया को अभी न जाने कितने मई दिवस मनाने पड़ेंगे।
और एक सवाल बार-बार उठता है — शिकागो में गूँजा वह नारा "Workers of the world, unite!" — आख़िर क्यों केवल मज़दूरों तक सिमटा रहे? जब हमारी प्राचीन भारतीय चेतना ने हज़ारों साल पहले ही उपनिषदों में कह दिया था —
॥ अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
"यह अपना है, यह पराया है — ऐसी सोच तो छोटे मन वालों की है। उदार हृदय वालों के लिए तो समूची धरा एक कुटुंब है।"
वसुधैव कुटुम्बकम् — समूचा ब्रह्मांड एक परिवार। अखिल ब्रह्मांड एक कुनबा।
तो आज का नारा क्यों न हो — Workers of Chicago, मज़दूरों दिल्ली, ढाका, करांची के, श्रमिकों समस्त अखिल ब्रह्मांड के — एक हो जाओ!
अंत में, चार ज़बानों की एक पुकार
Shelley की वह अमर पंक्तियाँ —
Rise like Lions after slumber
In unvanquishable number—
Shake your chains to earth like dew
Which in sleep had fallen on you—
Ye are many—they are few.
और मेरी आख़िरी सलामी, चार ज़बानों में —
🔴 दुनिया के मज़दूरों, एक हो!
🔴 اے محنت کشانِ عالم، متحد ہو جاؤ!
🔴 ॥ वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
🔴 Workers of the world, unite — you have nothing to lose but your chains!
मई दिवस ज़िंदाबाद!
इंक़लाब ज़िंदाबाद!
— एक "बिगड़ैल" क़लम की डायरी से
डॉ. अजय कुमार पाण्डेय
Advocate, Supreme Court of India
National General Secretary & Spokesperson, Lok Janshakti Party (Ram Vilas)
Founder, International Legal Protection Council of Journalists
Member, International Council of Jurists | World Independent Lawyers League | Hardward Square, London
1 मई 2026
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