ब्रेकिंग न्यूज़ – न्यूज़रूम के परदे के पीछे (भाग 4)
“एक पत्रकार जो खुद बना ख़बर – इंडिया-ओमान फ़र्टिलाइज़र डील की अनसुनी दास्तान”
🗓️ 26 जुलाई 1994 | लोकेशन: मस्कट, ओमान | मूड: बेक़रार, अलविदा कहता हुआ, और प्रेम में डूबा हुआ
आज से ठीक 31 साल पहले, मैं मस्कट के लिए उड़ान भर रहा था, लेकिन साथ जा रहा था एक पत्रकारिता का सपना, एक विद्रोही मन और एक अजीम इरादा — "मैं इस बार खबर ढूंढने नहीं, खबर बनाने जा रहा हूं।"
बेगूसराय से बीना तक: एक रिपोर्टर की उड़ान
बेगूसराय से 'Indian Nation' और 'Aryavart' में ब्लॉक रिपोर्टिंग से शुरुआत, फिर Northern India Patrika, इलाहाबाद में डॉ. मुरली मनोहर जोशी के इंटरव्यूज़, फिर TOI, पटना और Sandesh (Gujarati Daily) दिल्ली ब्यूरो के चीफ़ के तौर पर भारतीय संसद की सबसे कम उम्र में रिपोर्टिंग — यह सफर कम नहीं था।
लेकिन मिडिल ईस्ट में पॉलिटिक्स और क्राइम रिपोर्टिंग पर बैन था। एक रिपोर्टर के लिए ये पेशेवर मौत थी। लेकिन मैंने तय किया — मैं ख़बर बनाऊंगा।
इंडिया–ओमान फ़र्टिलाइज़र डील: जब पत्रकार ने पॉलिसी बनाई
1994 में भारत खाद संकट से जूझ रहा था। राम लखन सिंह यादव, केंद्रीय उर्वरक मंत्री थे। मैंने प्रस्ताव रखा— इंडिया–ओमान जॉइंट फ़र्टिलाइज़र प्रोजेक्ट, जिसमें ओमान भारत में निवेश करे, और भारत को मिले लॉन्ग-टर्म समाधान।
फाइलें चलीं, प्लान बना और 26 जुलाई को मैं मस्कट पहुंचा, 27 को मंत्री जी भी। डील साइन हुई। और उस दिन मैंने बतौर पत्रकार नहीं, बतौर क्रिएटर एक ब्रेकिंग स्टोरी गढ़ दी।
और तस्वीरें जो आज भी बोलती हैं...
साथ थे: राम विलास पासवान (पहली बार सांसद बने थे), वी. नारायणसामी (कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद, जो बाद में पुडुचेरी के मुख्यमंत्री बने), के.के. तिवारी (तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री), उर्मिलाबेन पटेल (तत्कालीन केंद्रीय विद्युत मंत्री), डॉ. जगन्नाथ मिश्र (तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री), रामेश्वर ठाकुर (तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री), श्री श्यामल घोष, आईएएस (जो आगे चलकर दूरसंचार सचिव बने), सुधांशु ओझा (अब जीएमआर ग्रुप में कार्यरत), मनोज सिंह (अब इंडिया बुल्स में वाइस प्रेसिडेंट - लीगल), और मेरे अनेक पत्रकार साथी, दीपक चौरसिया, प्रेमांशु शेखर, प्रदीप श्रीवास्तव, कुमार आंनद, सुरेश अखोडी, सुजीत वाजपेई।.
डॉ. आदिश अग्रवाला, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता, जो बाद में तमिलनाडू के महाअधिवक्ता के बने और सुप्रीम कोर्ट बार के अध्यक्ष।
विदाई की वो शाम...
क्रांतिकारी पत्रकार, विचारक और विद्वान लेखक, अवधेश कुमार, जो मेरे ओमान जाने के फ़ैसले से सहमत नहीं थे, फिर भी मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आए। ये अलग बात है कि विदाई पार्टी में उन्होंने विरोधस्वरूप भाग नहीं लिया।
उनकी स्वर्गीय पत्नी और मेरी छात्रा कुमारी कंचना, सुजीत वाजपेयी (दैनिक जागरण) व उनकी पत्नी सुनीता, सबने मेरी पैकिंग में मदद की। पैकिंग में था क्या? सिर्फ़ अख़बारों के बंडल और किताबें।
गूगल तब नहीं था, और किताबें ही मेरा इंटरनेट थीं।
घर से और परिवार से साथ दे रहे थे मेरे चुने हुए भाई और बहन — अमोद, आशीष और अंजलि।
पिताजी उस दिन भी साथ नहीं आ पाए थे... और आज भी नहीं हैं। लेकिन उनका आशीर्वाद और संघर्ष की सीख हमेशा हौसला देता रहा।
आज 31 साल बाद...
ज़िंदगी टीवी, वेब, डिजिटल, प्रिंट, हिंदी, अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं के इर्द-गिर्द घूम चुकी है। लेकिन वो 26 जुलाई 1994 का दिन — जब एक पत्रकार, एक पत्रकार नहीं रहा, बल्कि एक नीतिकार बना — वो दिन आज भी सबसे खास है।
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